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वन्या: द्वंद्व 🫀 – 3

वन्या: द्वंद्व 🫀 – 3

“मेरी प्यारी टीचर…”

 

“क्या सोचकर खड़ी थीं…? अच्छा हुआ यहाँ उतरने के लिए इतने लोग थे, वरना बस वाले हमें उतारे बिना ही बस लेकर चले जाते…”

 

सती मज़ाकिया अंदाज़ में कहते हुए गूगल मैप निकालकर रास्ता देखने लगी।

 

“सिंधु टीचर पहुँच गई हैं… उन्होंने मुझे लोकेशन भेजी थी। सिर्फ पाँच सौ मीटर है… चलें या ऑटो बुलाएँ…?”

 

वृंदा की तरफ सिर झुकाकर पूछते समय वृंदा किसी सोच में डूबी हुई थी।

 

“चलते हैं ना… बेवजह पैसे क्यों खर्च करें…”

 

वृंदा को इस तरह सोच में डूबा देखकर सती ने खुद ही उसका जवाब भी दे दिया। वृंदा ने बस यूँ ही सिर हिला दिया।

 

“तो चलिए… इधर ही लोकेशन दिखा रहा है।”

 

बिना हिले खड़ी वृंदा की बाँह पकड़कर एक झटके से खींचते हुए सती आगे चल पड़ी।

 

तभी वृंदा को थोड़ी होश आया।

 

“अरे… मैं अचानक… उस बस से उतरने के शॉक में…”

 

वृंदा ने सती की ओर देखते हुए शब्दों को जोड़कर कहने की कोशिश की तो सती ने सिर हिला दिया।

 

“हाँ, वो समझ गई… अचानक पकड़कर नीचे उतारा ना, इसलिए डर गई होंगी।”

 

“हाँ… हाँ…”

 

साड़ी का पल्लू थोड़ा ऊपर उठाकर वृंदा ने माथे का पसीना पोंछा।

 

“देखिए… बस थोड़ा ही और है… अभी पहुँच जाएँगे…”

 

सती फोन देखते हुए आगे चल रही थी।

 

वृंदा उसके पीछे-पीछे चल रही थी।

 

कुछ देर बाद वे वहाँ पहुँच गए।

 

सबसे पहले उन्हें दो बड़े-बड़े घर दिखाई दिए।

 

उनके आगे एक बहुत बड़ा मैदान था…

 

वहीं कार्यक्रम था…

 

एक शानदार स्टेज और उसके मुताबिक बज रहे गाने सड़क पर खड़े-खड़े ही उन्हें सुनाई दे रहे थे।

 

“टीचर, ज़रा रुकिए… बाल सारे उड़कर बिखर गए हैं। खड़े रहने की वजह से इतने अस्त-व्यस्त हो गए हैं… थोड़ा ठीक करके चलते हैं…”

 

सती ने कहते हुए अपने बैग से एक छोटा-सा पॉकेट मिरर निकाला और वृंदा की ओर बढ़ा दिया।

 

सच में उसके सारे बेबी हेयर्स ऊपर उठे हुए थे।

 

वृंदा ने उँगलियों से उन्हें ठीक किया और मिरर वापस कर दिया।

 

“अब तो देखने में बहुत ही खूबसूरत लग रही हैं…”

 

उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए सती ने कहा तो वृंदा ने छोटी-सी मुस्कान के साथ उसकी ओर आँखें तरेरकर देखा।

 

“मैं कुछ ज़्यादा ही कर रही हूँ ना…?”

 

“अरे… थोड़ा नहीं… ज़रा सा…”

 

उसी अंदाज़ में वृंदा ने भी कहा।

 

सती ने दोनों हाथ कमर पर रखकर उसे घूरकर देखा।

 

“ये क्या… दोनों टीचर्स सड़क पर खड़े होकर कथकली कर रही हैं क्या…?”

 

इतनी देर हो जाने के बाद भी उन्हें वहाँ न देखकर सिंधु टीचर उन्हें ढूँढते हुए सड़क तक आई थीं।

 

“नहीं टीचर… हम तो बस…”

 

“हम्म…”

 

“अब तो बच्चों से भी बदतर हालत है तुम दोनों की…”

 

“तुम दोनों को दिखाई नहीं दिया तो मैं ढूँढते हुए आई। काफी देर हो गई है, मैंने मैसेज भी कर दिया था कि तुम लोग पहुँच गई हो…”

 

टीचर ने चिंता से कहा।

 

“चलो… नई दुल्हन और वसुंधरा टीचर से मिलना नहीं है क्या? या फिर दोनों सड़क पर खड़े होकर यूँ ही आँखें तरेरते रहोगी…?”

 

सिंधु उन्हें चिढ़ाते हुए आगे चल पड़ी।

 

उसके पीछे दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखकर हँसते हुए चल पड़ीं।

 

‘वसुंधरम’ नाम खुदा हुआ उस घर में प्रवेश करते समय आँगन में ही रखी गई कुर्सियों के एक बड़े समूह में स्कूल की सारी टीचर्स गोल घेरा बनाकर बैठी हुई थीं।

 

“ये क्या… हमारी स्कूल की महिला मंडली को यहाँ शिफ्ट कर दिया क्या…?”

 

सती ने सिर्फ वृंदा को सुनाई दे इतनी धीमी आवाज़ में उसके कान के पास जाकर कहा।

 

वृंदा एकदम चौंककर चारों तरफ देखने लगी और उसके हाथ पर एक चुटकी काट दी।

 

“चुप रहो ना…”

 

साथ ही सख्त आवाज़ में कहा।

 

सबने मिलकर पैसे जोड़कर स्कूल की तरफ से एक गिफ्ट खरीदा था।

 

अभी दो-तीन लोग और आने बाकी थे…

 

उनके आने के बाद ही वह गिफ्ट दिया जा सकता था।

 

उनका इंतज़ार करते हुए ही वहाँ बैठे सभी लोग उस तरफ देख रहे थे।

 

वहाँ बैठने में बिल्कुल दिलचस्पी न होने के कारण सती ने वृंदा को भी साथ लिया और घर देखने के बहाने वहाँ से निकल गई।

 

सच कहें तो वह सच में एक बहुत बड़ा घर था…

 

“ये सब भी देखना है…”

 

सती हर चीज़ को देखते हुए और उसके बारे में बोलते हुए आगे चल रही थी।

 

उसके पीछे वृंदा भी बिना किसी खास दिलचस्पी के चल रही थी।

 

उसके मन में तो सिर्फ जीवन् ही भरा हुआ था।

 

वह बस यही मानना चाहती थी कि उसके पास बैठी वह लड़की जीवन् के साथ नहीं थी।

 

चलते-चलते वे नई दुल्हन के कमरे के दरवाज़े तक पहुँच गईं।

 

वहीं वसुंधरा टीचर और उनकी टीम बैठी हुई थी।

 

अपनी बेटी को तैयार होते देखकर टीचर मुस्कुराते हुए बैठी थीं।

 

“अरे… ये कौन हैं… सती और वृंदा हैं क्या…?”

 

सामने खड़ी दोनों को देखते ही वह खुशी से मुस्कुराते हुए उन्हें गले लगा लिया।

 

“बहुत खुशी हुई बच्चों… तुम दोनों आ गईं…”

 

दोनों के हाथ पकड़कर उन्होंने कहा।

 

“अगर देर हो जाए तो यहाँ रुकने में बिल्कुल भी झिझकना मत, ठीक है…? कमरे वगैरह सब ठीक करवा दिए हैं… सती हॉस्टल में रहती है ना, इसलिए कह रही हूँ…”

 

“इसीलिए तो आए भी हैं… अब आज तो यहाँ रुककर ही जाना पड़ेगा…”

 

“सिर्फ आज ही क्यों… शादी होने तक तुम दोनों यहीं रहो…”

 

“ऐसे लालच मत दीजिए टीचर… मैं सच में फँस जाऊँगी…”

 

सती के साथ बातें करते हुए, खिलखिलाकर हँसते हुए वृंदा भी वहीं खड़ी रही।

 

टीचर की बेटी से भी परिचय करने के बाद ही वे कमरे से बाहर निकलीं।

 

“अच्छी लड़की है ना… देखने में भी कितनी खूबसूरत है…”

 

थोड़ी-सी जलन के साथ वृंदा की ओर देखते हुए सती ने कहा।

 

“बिल्कुल भी जलन नहीं है ना टीचर…”

 

वृंदा ने उसकी जाँघ पर चुटकी काटते हुए कहा तो सती ने “ओह, दर्द हुआ” जैसा चेहरा बनाकर उसके साथ चलना जारी रखा।

 

सात बजते ही कार्यक्रम शुरू हो गए।

 

वसुंधरा टीचर के पति बिज़नेसमैन थे, इसलिए यह उनके साथ-साथ स्कूल की टीचर्स के लिए भी रखा गया एक खास फंक्शन था।

 

शादी में अभी तीन-चार दिन बाकी थे…

 

उन सभी दिनों को संगीत, मेहंदी, ढोलकी और हल्दी जैसे कार्यक्रमों और जश्न के लिए तैयार करके रखा गया था।

 

सभी टीचर्स ने मिलकर एक सोने की चेन दी।

 

उसे स्टेज पर जाकर दिया गया और सभी ने मिलकर एक फोटो भी खिंचवाई।

 

फिर खाना…

 

उसके बाद अगली दौड़ शुरू हुई…

 

वह भी खत्म होने के बाद सभी घर जाने की तैयारी में लग गए।

 

कल शनिवार था, इसलिए क्लास नहीं थी…

 

यही सभी के लिए एकमात्र राहत थी।

 

समय नौ बजे के पार हो चुका था।

 

ज़्यादातर लोग जा चुके थे।

 

“आपके हसबैंड आपको लेने आएँगे…?”

 

अचानक सती ने पूछा।

 

पहले क्या कहे, यह सोचकर वृंदा घबरा गई, लेकिन फिर किसी तरह उसने कह दिया कि वह नहीं आएँगे।

 

“तो फिर हम दोनों साथ रहेंगे टीचर…”

 

सती के चेहरे पर खुशी भर गई।

 

लेकिन वृंदा का मन पूरी तरह बेचैनी से भर गया था…

 

पहली बार उसे उस घर पर फोन करने का मन हुआ।

 

जीवन् रात के दस बजे के बाद घर पहुँचता।

 

उसने तय किया कि थोड़ी देर और रुककर पिताजी के फोन पर कॉल करेगी।

 

आँगन में खाली पड़ी एक कुर्सी पर आकर बैठकर अँधेरे में आँखें टिकाए रहने से ही उसे थोड़ी राहत मिली।

 

उस कुर्सी के पाए से सिर टिकाकर वृंदा काफी देर तक बैठी रही।

 

इस ज़िंदगी का बहाव आखिर किस दिशा में जा रहा है, उसे सच में कुछ भी समझ नहीं आ रहा था…

 

इस पल तक उसे अपनी ज़िंदगी एक अर्थहीन ज़िंदगी जैसी ही लग रही थी।

 

“यहाँ बैठकर सोना मत… चलो… आज हमें सामने वाले घर में सोना है…”

 

आँखें बंद करके पड़ी वृंदा को हिलाते हुए सती ने कहा।

 

“वो सामने क्यों…?”

 

“हाँ… वो भी इनका ही घर है। आज यहाँ कमरे खाली नहीं हैं, इसलिए वसुंधरा टीचर ने वहाँ जाकर सोने के लिए कहा है…

 

वैसे अच्छा ही है… यहाँ सबके साथ कैसे सोएँगे…? इतना शोर और हंगामा है…”

 

सती ने अपना सिर झटका।

 

तभी वसुंधरा टीचर चाबियों का एक गुच्छा लेकर वहाँ पहुँचीं।

 

“आओ बच्चों… मैं दरवाज़ा खोल देती हूँ…”

 

कहते हुए वह आगे चल पड़ीं और दोनों उनके पीछे-पीछे अपने बैग उठाकर चल पड़ीं।

 

वह घर वसुंधरा टीचर के घर से भी थोड़ा बड़ा था।

 

“देखो… ये नीचे के दो कमरे हैं…”

 

दरवाज़ा खोलकर अंदर जाते हुए वसुंधरा ने लाइट और पंखा चालू किया।

 

“यहाँ ऐसा कोई परेशानी वाला इलाका नहीं है… ठीक बगल में लोगों की आवाजाही भी रहती है…

 

डरने की कोई बात नहीं है…”

 

यह भरोसे से कहते हुए उन्होंने चाबियों का गुच्छा वृंदा की ओर बढ़ा दिया।

 

दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उन्हें देखती रहीं।

 

“तो गुड नाइट बच्चों… वहाँ के काम अभी खत्म नहीं हुए हैं…”

 

चेहरे पर मुस्कान रखते हुए थोड़ा जल्दी-जल्दी कहकर वह वहाँ से निकल गईं।

 

दोनों ने भी उन्हें गुड नाइट कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया।

 

“आह… तो वृंदा टीचर को कौन-सा कमरा चाहिए…? ये या वो…?”

 

वसुंधरा के जाते ही सामने दिखाई दे रहे दोनों कमरों की ओर देखते हुए सती ने पूछा।

 

वृंदा ने आँखें तरेरकर उसे देखा।

 

“एक ही कमरे में सोते हैं…”

 

“अरे नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…

 

मुझे अपने होने वाले दूल्हे को फोन करना है…

 

वो सब सुनते हुए टीचर को परेशानी नहीं होगी क्या…?”

 

थोड़ी शर्म का भाव बनाकर वह खड़ी रही, लेकिन वृंदा नहीं मानी।

 

“मुझे उससे कोई परेशानी नहीं है सती… हम दोनों साथ ही रह लेते हैं…”

 

“मुझे तो परेशानी है मेरी टीचर…

 

कल मैं टीचर के चेहरे की तरफ कैसे देखूँगी…? इसीलिए…

 

फिर टीचर को भी अपने पति को फोन करना होगा ना…

 

मैं रहूँगी तो प्राइवेसी चली जाएगी…

 

इसलिए पहले टीचर बताइए कि आपको कौन-सा कमरा चाहिए!”

 

वह ज़िद पर अड़ गई तो वृंदा नाराज़ होकर उसके पास वाले कमरे में चली गई।

 

उसकी नाराज़गी देखकर सती हल्की-सी मुस्कान के साथ सामने वाले कमरे में चली गई।

 

सच कहें तो वृंदा डर रही थी…

 

अनजान जगह थी ना…

 

अब उसे लगने लगा था कि उसे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था…

 

बैग एक टेबल पर रखकर वह बेड पर जाकर बैठ गई।

 

फिर से उसका मन जीवन् में अटक गया तो उसने सब कुछ छोड़कर पिताजी को फोन किया।

 

थोड़ी-बहुत बातें करने के बाद बीच में उसने उसी के बारे में पूछा तो बस इतना समझ आया कि वह वहाँ घर पर आ चुका है।

 

तभी उसे थोड़ी राहत मिली…

 

किसी के साथ भागकर नहीं गया है…!!!

 

खुद को चुटकी काटते हुए जब उसने महसूस किया कि सीने में राहत भर रही है, तो वह सुकून से फोन रख दिया।

 

उसे बहुत ज़ोर से प्यास लगी थी।

 

लेकिन यह अनजान घर था, इसलिए उसे कुछ भी पता नहीं था कि क्या कहाँ है…

 

इसलिए वह रसोई ढूँढने भी नहीं गई।

 

इस घर में उन्हें इस तरह अकेला छोड़कर वसुंधरा टीचर का चले जाना वृंदा को सच में अच्छा नहीं लगा था…

 

फिर भी सती अगले कमरे में है, यही उसकी एकमात्र राहत थी…

 

इस तरह थोड़ा शांत मन लेकर वृंदा ने लाइट बंद की और लेट गई।

 

अपने मन को काबू में रखते हुए जैसे ही उसने आँखें बंद कीं, उसी समय दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई दी…

 

फिर भी वृंदा नाराज़गी में बिना देखे ही लेटी रही।

 

“अच्छा तो… लड़की को कितनी बार बुलाया था… और अब आ गई है नाराज़गी दूर करने…”

 

जारी रहेगा… ❤️

 

पढ़ने वाले दो लाइन अपनी राय ज़रूर बताइएगा…