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वन्या: द्वंद्व 🫀 – 2

वन्या: द्वंद्व 🫀 – 2

“टीचर… वृंदा टीचर… ज़रा रुकिए…!!”

 

स्कूल की छुट्टी होते ही बैग कंधे पर टाँगे, साड़ी का पल्लू थोड़ा संभालते हुए स्कूल के गेट से बाहर निकल रही वृंदा को देखकर सती टीचर उसके पीछे-पीछे चल पड़ी।

 

“आह… आज क्या हुआ टीचर… देर हो गई क्या?”

 

अपने पास पहुँचने के लिए जल्दी-जल्दी चलती हुई सती को देखकर वृंदा भी रुक गई।

 

“अरे नहीं… मैं देर से नहीं आई। टीचर आज थोड़ा जल्दी निकल गईं, इसलिए ऐसा लग रहा है…”

 

सती की उस मज़ाकिया बात पर वृंदा को हँसी तो नहीं आई, फिर भी उसने हल्की-सी मुस्कान दे दी।

 

बस यूँ ही…

 

“क्या हुआ सती टीचर… मुझसे कुछ कहना था क्या?”

 

दोनों साथ चलते हुए जा रही थीं, तभी वृंदा ने ही बात शुरू की।

 

“हमारी वसुंधरा मैम की बेटी का फंक्शन आज ही है ना टीचर… शाम को जा नहीं रही हैं क्या, यही पूछने के लिए बुलाया था। हॉस्टल में रहती हूँ ना, इसलिए साथ चलने वाला भी कोई नहीं है। टीचर तो वैसे भी आ रही हैं ना… हम दोनों साथ चलेंगे।”

 

सती बड़े उत्साह से पूछ रही थी, तभी वृंदा को याद आया कि आज ऐसा कोई फंक्शन भी है।

 

“ओह… आज है ना वो फंक्शन… मैं तो भूल ही गई थी सती…”

 

वृंदा ने थोड़ी परेशानी के साथ उसकी ओर देखा।

 

“उसमें क्या है… रात को सात बजे ही तो शुरू होगा। अभी तो चार बजे हैं। घर जाकर फ्रेश होकर तैयार हो जाइए और उस चौराहे पर आ जाइए। मैं भी वहीं आ जाऊँगी…”

 

सती ने जैसे पहले से ही सब प्लान कर रखा था, उसी अंदाज़ में कहा तो वृंदा थोड़ी झिझक गई।

 

“लेकिन मैंने… घर पर कुछ बताया ही नहीं है…”

 

वह बस निकलने का कोई बहाना ढूँढ रही थी।

 

“उसके लिए इतना पूछने की क्या ज़रूरत है? क्या टीचर कोई छोटी बच्ची हैं?

 

फंक्शन खत्म होने के बाद हम वापस आ जाएँगे। नहीं तो वसुंधरा मैडम के गेस्ट हाउस में रुक सकते हैं। टीचर डरिए मत…”

 

सती ने उसकी तनाव भरी शक्ल देखकर समझाते हुए कहा।

 

“जब अपने किसी साथी के घर में कोई कार्यक्रम हो रहा हो, तो हमें जाना चाहिए ना…”

 

वृंदा को मनाने के लिए सती एक के बाद एक कारण गिना रही थी… और उनमें से आधे कारणों से वृंदा भी लगभग मान चुकी थी।

 

“अगर वहाँ रुकने में ज़्यादा परेशानी हो तो टीचर अपने हसबैंड को फोन करके बुला लेना। मैं सुबह चली जाऊँगी…”

 

यह सुनते ही वृंदा पूरी तरह फँस गई।

 

“ह्म्म… मैं घर पहुँचकर फोन करूँगी टीचर…”

 

फिलहाल इस बातचीत को खत्म करने का उसके पास यही एक रास्ता था। उसके बाद तो भवानी नाम की एक और मुश्किल पार करनी थी।

 

“ठीक है… देखिए, आपकी बस भी आ गई…”

 

सामने आकर रुकी बस की ओर इशारा करते हुए सती ने कहा और उसके खत्म करते-करते वृंदा बस में चढ़ भी गई।

 

बस में बैठते समय भी उसके दिमाग में यही चल रहा था कि माँ से यह बात कैसे कहे।

 

सुबह जो कुछ हुआ था, उसके बाद…

 

फिर उसने आखिरकार सब कुछ छोड़कर सामना करने का फैसला कर ही लिया।

 

जो पति उसकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखता और जिस सास की ज़ुबान पर कोई लगाम नहीं है, उनके बारे में सोचकर वह अपनी खुशी क्यों खराब करे?

 

थोड़ा सोचने के बाद उसके मन में यही बात आई।

 

आखिर थोड़ी देर के लिए ही सही, खुश रहने की इच्छा किसे नहीं होती?

 

मन ही मन अपना मास डायलॉग बोलकर खुश हो ही रही थी कि उसका उतरने वाला स्टॉप आ गया।

 

घर जाते समय उसके दिमाग में यही चल रहा था कि कौन-सी ड्रेस पहनेगी… कौन-सा हार पहनेगी…

 

इन्हीं सब बातों को सोचते हुए वह घर के अंदर दाखिल हुई, लेकिन आँखें सिकोड़कर उसे घूरती खड़ी अपनी सास पर उसने ध्यान ही नहीं दिया।

 

कमरे में जाकर सबसे पहले फ्रेश हुई। फिर हमेशा की तरह कड़क चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई।

 

चार गिलास पानी चढ़ाया। पानी उबलने लगा तो उसमें चायपत्ती डालकर चारों गिलासों में चाय बाँट दी।

 

दो गिलास मेज़ पर रख दिए। उसे पता था कि भवानी आकर उन्हें ले जाएँगी।

 

एक चाय पिता जी को भी दे आई।

 

“माँ जो कुछ भी कहती हैं, उसे दिल पर मत लेना बेटी…”

 

उसे देखते ही पिता जी ने बड़े प्यार से यही कहा।

 

“अरे… मुझे अपनी माँ जैसी ही लगती हैं यहाँ की माँ भी…”

 

वृंदा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा।

 

उस इंसान से उसे ज़रा भी नाराज़गी नहीं थी।

 

इतना तो उसे पता था कि उन्होंने कभी उसके पिता की बहुत मदद की थी।

 

वह एक अच्छे दिल के इंसान हैं, यह भी वह जानती थी।

 

और उसके पिता के बहुत अच्छे दोस्त भी हैं।

 

शायद इसी वजह से यह रिश्ता भी आया था।

 

उस एक फैसले के अलावा आज तक वृंदा को लगा था कि उसने कोई गलती नहीं की।

 

“कुछ कहना है बेटी…?”

 

उसका इस तरह झिझककर खड़ा रहना देखकर उन्होंने यूँ ही पूछ लिया।

 

“ह्म्म… साथ काम करने वाली एक टीचर की बेटी की शादी का फंक्शन है पापा… उन्होंने मुझे भी बुलाया है। शाम को जाऊँगी… वही बताने आई थी…”

 

वृंदा ने बात अधूरी छोड़ दी।

 

“तो इसमें क्या है बेटी… जाकर आओ। यहाँ यूँ बैठी रहना भी कोई अच्छी बात नहीं है, यह बात पापा से ज़्यादा और कौन समझ सकता है…”

 

उन्होंने खुशी-खुशी जाने की इजाज़त दे दी तो वृंदा का चेहरा खुशी से खिल उठा।

 

कमरे से बाहर निकलते ही उसने सबसे पहले सती टीचर को फोन किया।

 

छह बजे चौराहे पर पहुँचने के लिए कहा गया था।

 

वहाँ पहुँचने की हामी भरकर जैसे ही उसने फोन रखा, उसकी नज़र सामने आँखें फाड़कर उसे घूरती भवानी पर पड़ी।

 

“अभी तूने कहाँ जाने की बात कही थी?”

 

“एक फंक्शन है… उसमें मुझे…”

 

“इस वक्त?”

 

उन्हें यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई थी।

 

“हाँ… अगर कार्यक्रम इसी वक्त रखा है तो इसी वक्त ही तो जाना पड़ेगा…”

 

वृंदा ने बिना किसी खास दिलचस्पी के जवाब दिया तो भवानी का गुस्सा और बढ़ गया।

 

“उससे पूछा तूने…? उसने जाने की इजाज़त दी है…? इस वक्त बाहर घूमने निकलने के लिए…”

 

“मैं उससे क्यों पूछूँ…? क्या माँ के बेटे ने कहीं जाने से पहले मुझसे पूछकर जाता है…!!

 

इस वक्त बेवक्त रस्सी से छूटे बैल की तरह घूमने वाला मैं नहीं, आपका बेटा ही है।

 

इसलिए ये सवाल पहले जाकर उससे पूछिए… उसके बाद मुझे सुधारने आइएगा…”

 

“इसीलिए तो मेरा बेटा इससे दूर रहता है… इसकी ज़ुबान ही ऐसी है…”

 

वृंदा की तरफ बिना कोई ध्यान दिए कमरे में जाते हुए देखकर भवानी बड़बड़ाती रह गई।

 

कमरे में पहुँचते ही वृंदा फिर एक अच्छी-सी साड़ी ढूँढने में लग गई।

 

स्कूल की सारी टीचर्स होंगी…

 

इसलिए सोच-समझकर तैयार होकर जाना पड़ेगा।

 

अगर किसी ने कोई कमी निकाल ली, तो फिर उसी बात को लेकर सवाल-जवाब शुरू हो जाएँगे।

 

वैसे भी अभी से पीछे पड़ गई हैं कि बच्चे नहीं हुए क्या…

 

और अगर वहाँ निराश प्रेमिका वाला लुक लेकर चली गई, तो फिर इन महिला मंडली वालों के लिए उतना ही काफी होगा।

 

यही सब सोचते हुए उसने हल्की हरी रंग की साड़ी निकाल ली।

 

बहुत करीने से प्लीट्स बनाकर साड़ी पहनी और पल्लू एक ही प्लेट में फैलाकर छोड़ दिया।

 

बालों की चोटी बनाकर आगे कर ली।

 

माथे पर हल्का-सा सिंदूर और भौंहों के बीच छोटी-सी काली बिंदी लगा ली।

 

आँखों पर आईलाइनर से हल्की-सी विंग बना ली।

 

सबसे आखिर में अपने पतले होंठों पर न्यूड शेड की लिपस्टिक लगाई तो देखने में वह काफी खूबसूरत लग रही थी।

 

कमर पर हाथ रखकर इधर-उधर झुककर खुद को आईने में देखते हुए वह खुद ही बड़बड़ाई।

 

फिर फोन में दो सेल्फी भी ले लीं।

 

साड़ी से मैच करता हुआ बैग उठाकर वह बाहर निकल आई।

 

हॉल में पहुँची तो माँ मुँह फुलाए बैठी थीं।

 

वृंदा ने देखा, लेकिन उन्हें ज़्यादा भाव देने की कोशिश नहीं की।

 

लेकिन उनके पास बैठी जीविका उसे जिस तरह घूर-घूरकर देख रही थी, वह वृंदा ने बड़े मज़े से देखा।

 

फिर उसे एक अच्छी-सी मुस्कान देकर वह पिता जी के कमरे में चली गई।

 

उनसे विदा लेकर ही वृंदा सीढ़ियाँ उतरकर बाहर निकली।

 

“मनमानी करने वाली…”

 

वृंदा को उस तरह जाते देखकर भवानी ने मुँह फेरकर बड़बड़ाया।

 

लेकिन जीविका का पूरा ध्यान वृंदा की कलाई में बंधी घड़ी पर था।

 

“किसी भी तरह इसे हासिल करना है…”

 

पहले कितनी ही चीज़ें थीं जो वह ‘एठत्ती’ कहकर प्यार से उसके पास जाकर माँगती थी और वृंदा दे दिया करती थी।

 

अब कुछ भी नहीं देती…

 

इन सबकी वजह यही माँ है…

 

भवानी की ओर देखते हुए जीविका ने गुस्से में दाँत पीसे।

 

वृंदा को सती के बताए चौराहे तक पहुँचने में थोड़ा समय लगता था, इसलिए वह बस में बैठकर वहाँ पहुँची।

 

वहाँ पहुँचकर देखा तो सती पहले से ही उसका इंतज़ार कर रही थी। वह एक छोटे-से वेटिंग शेड जैसे बने बैठने की जगह पर बैठी थी।

 

“आह, टीचर आ गईं!”

 

कहते हुए सती मुस्कुराकर खड़ी हो गई।

 

“मैं ज़्यादा देर से तो नहीं आई ना सती टीचर…?”

 

“नहीं… दस मिनट और बीत जाएँ तो वसुंधरा टीचर के यहाँ जाने वाली बस मिल जाएगी।

 

उस रूट पर बसें कम हैं ना…

 

टीचर यहाँ बैठिए…”

 

सती थोड़ा खिसक गई।

 

वृंदा ने उस जगह पर धूल हो तो हो, यह सोचकर हाथ से दो बार झाड़ा और बैठ गई।

 

“धूल नहीं होगी टीचर… लोग तो यहाँ बैठते ही रहते हैं…”

 

“फिर भी… मन की शांति के लिए…”

 

इसके बाद भी दोनों कुछ देर तक बातें करती हुई वहीं बैठी रहीं।

 

“देखिए… पार्थसारथी आ रही है… यही है वो बस जिसके बारे में मैंने कहा था…”

 

नीले रंग की टूरिस्ट बस जैसी एक बस सामने आकर रुकी तो सती के साथ वृंदा भी जल्दी से उसमें चढ़ गई।

 

खुशकिस्मती से दोनों को सीट मिल गई।

 

सच कहें तो वृंदा को इस जगह की ज़्यादा जानकारी नहीं थी। सती का साथ ही उसका एकमात्र सहारा था।

 

टिकट भी ले लिया तो दोनों आराम से सीट पर टिककर बैठ गईं।

 

“टीचर पर ये साड़ी बहुत अच्छी लग रही है…”

 

सती ने कहते हुए साड़ी को हल्के से छुआ।

 

“शादी के समय भैया बहुत सारी साड़ियाँ लेकर आए थे… उन्हीं में से एक है…”

 

“अच्छा… आपका अपना भैया भी है?”

 

“क्यों नहीं… एक भैया है और एक भाभी भी है…”

 

यह कहते समय वृंदा के चेहरे पर खिली मुस्कान को सती ध्यान से देख रही थी।

 

“बहुत प्यार है लगता है…”

 

“बिल्कुल…”

 

उसका जवाब भी उसी मुस्कान के साथ था।

 

“घर में कौन-कौन हैं टीचर?”

 

“माँ-पापा, ये भैया और भाभी… अभी भाभी के यहाँ खुशखबरी आने वाली है। छुट्टियाँ होने वाली हैं ना… इसलिए थोड़े दिनों के लिए घर जाकर रहना है…”

 

वृंदा ने अपने मन की बात खुलकर बता दी।

 

“हाँ… शादी के बाद तो हम सब मेहमान ही बन जाते हैं ना बेटी… मेरा भी रिश्ता तय हो गया है।

 

वो गल्फ में है… इसलिए शादी एक साल बाद ही होगी। इसी बात की खुशी है मुझे…”

 

स्कूल में वृंदा की सबसे दोस्ती थी, लेकिन उसने किसी के साथ इतनी गहरी दोस्ती नहीं बनाई थी कि मन खोलकर बातें कर सके।

 

इसलिए उसे भी उनके बारे में और उन्हें भी उसके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था।

 

अब सती इस तरह बिना किसी झिझक के बातें करती जा रही थी, इसलिए वृंदा भी जवाब देती जा रही थी।

 

शायद इसलिए भी क्योंकि वह इतनी जल्दी किसी से घुलने-मिलने वाली लड़की नहीं थी।

 

दोनों बातें करते हुए बैठी थीं कि अगले स्टॉप से एक बुज़ुर्ग महिला बस में चढ़ीं।

 

देखने से ही लग रहा था कि उनसे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।

 

वृंदा सीट के किनारे बैठी थी, इसलिए वह तुरंत उठकर खड़ी हो गई और उन्हें अपनी जगह बैठा दिया।

 

वैसे भी दो-तीन स्टॉप के बाद उसे उतरना ही था, इसलिए ज़्यादा देर खड़ा नहीं रहना पड़ेगा।

 

बस तेज़ चल रही थी, इसलिए उसने एक लंबे लोहे के डंडे को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़ लिया। एक हाथ सीट के ऊपर भी टिकाया हुआ था।

 

उसके बाल हवा में उड़ने लगे तो वह हवा के उल्टी दिशा की ओर थोड़ा झुककर खड़ी हो गई।

 

अब पीछे की सीटों पर बैठे लोगों को आसानी से देखा जा सकता था।

 

यूँ ही उसकी नज़र पीछे की ओर गई तो पुरुषों वाली सीट के सबसे किनारे बैठे जीवन् पर उसकी नज़र पड़ी।

 

भौंहें सिकुड़ना और दिल का एक पल के लिए ज़ोर से धड़क उठना एक साथ हुआ।

 

उसके ठीक बगल में एक लड़की बैठी थी…

 

उसकी गोद में एक बच्चा था।

 

और जीवन् की गोद में एक बड़ा-सा बैग रखा हुआ था।

 

कुछ ही पलों में उसके मन की ज़मीन जैसे हिल गई।

 

उसे देखकर जीवन् की नज़र उस पर न पड़ जाए, इसलिए उसने तुरंत अपना चेहरा घुमा लिया और बस के आगे की ओर देखने लगी।

 

लेकिन उसके मन में बस यही सवाल घूम रहा था कि खुद की गाड़ी होने के बावजूद वह इस बस में क्यों आया था?

 

और उसके साथ बैठी वह लड़की और उसकी गोद में बच्चा… क्या वे जीवन् के साथ थे?

 

जब उसके सिर में ऐसे ढेरों सवाल घूम रहे थे, तभी बस रुक गई।

 

उसी समय सती ने उसका हाथ पकड़कर उसे बस से बाहर खींच लिया।

 

जारी रहेगा… ❤️

 

पढ़ने वाले दो लाइन अपनी राय ज़रूर बताइएगा… ❤️