सफ़ेद पिल्ला – 1
एक छोटा और बेहद खूबसूरत गाँव था। गाँव के बाहर एक पुराना, टूटा-फूटा बस स्टॉप बना हुआ था।
वहाँ एक घंटे के अंतराल में बसें आती-जाती रहती थीं। बस स्टॉप के ठीक सामने दूर तक फैली रेल की पटरियाँ साफ़ नज़र आती थीं।
वहीं पास में एक विशाल, घना बरगद का पेड़ खड़ा था, जिसके नीचे एक पक्का चबूतरा बना था।
जेठ की कड़कड़ाती गर्मी का मौसम था। आसमान से मानो आग के गोले बरस रहे थे और गर्म लू के थपेड़े हवा में तैर रहे थे।
लेकिन बरगद की ठंडी छाया राहत पहुँचा रही थी।
उसी बरगद के चबूतरे के पास एक व्यक्ति बर्फ़ से ठंडा गन्ने का रस बेचता था।
इस भीषण दोपहर में यात्रियों की भीड़ गन्ने के रस की दुकान पर उमड़ पड़ी थी।
तभी दोपहर को विद्यालय की घंटी बजी। आठवीं कक्षा का छात्र ‘राजू’ अपनी साइकिल से घर लौट रहा था।
पसीने से लथपथ राजू ने बस स्टॉप पर गन्ने के रस का ठेला देखा और साइकिल रोककर रस पीने लगा।
रस पीते समय राजू की नज़र सामने रेल की पटरी की तरफ़ गई।
वहाँ से एक छोटा, बेहद मासूम और सफ़ेद रंग का कुत्ते का पिल्ला आता दिखाई दिया।
भीषण गर्मी और प्यास के कारण उस बेज़ुबान पिल्ले का बुरा हाल था; उसकी जीभ मुँह से बाहर निकली हुई थी और वह तेज़-तेज़ साँसें ले रहा था।
पिल्ला धीरे-धीरे घसीटते कदमों से गन्ने की दुकान के पास आ बैठा।
उस बेज़ुबान की आँखें ललचाई हुई थीं। वह आस-पास खड़े लोगों के चेहरे को उम्मीद भरी कातर निगाहों से देख रहा था।
लेकिन कोई भी उसकी इस मूक पीड़ा को नहीं समझ सका।
जब किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, तो वह निराश होकर और अपने उदास चेहरे के साथ वापस रेल की पटरी की ओर लौटने लगा।
यह दृश्य देखकर राजू का दिल पिघल गया। उसके चेहरे पर गहरी चिंता और दया के भाव तैर गए।
राजू बिना एक पल गँवाए दौड़कर उस मासूम पिल्ले के पास पहुँचा।
उसने बड़ी आत्मीयता से पिल्ले को अपनी गोद में उठाया और वापस दुकान पर ले आया।
राजू ने प्लास्टिक के गिलास में ठंडा गन्ने का रस लिया और पिल्ले के सामने रख दिया। पिल्ले ने तृप्त होकर भरपेट रस पिया।
रस पीते ही उसके चेहरे पर एक अजीब-सी राहत और आँखों में चमक आ गई।
राजू ने दुकान पर खड़े लोगों और दुकानदार की ओर देखा, जिनके चेहरे पर अब ग्लानि और आश्चर्य के भाव थे।
राजू ने उनसे नम्रतापूर्वक कहा, “हमें इंसानों के साथ-साथ इन बेज़ुबान पशु-पक्षियों की भावनाओं को भी समझना चाहिए, क्योंकि ईश्वर ने प्यास और भूख की तड़प इन्हें भी इंसानों जितनी ही दी है।”
राजू की बात सुनकर वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें शर्म से झुक गईं और उन्हें दया का पाठ समझ आ गया।
सीख:
बेज़ुबान पशु-पक्षी अपनी भूख और प्यास बोलकर व्यक्त नहीं कर सकते। एक संवेदनशील और सच्चा मनुष्य वही है जो उनकी मूक भावनाओं को समझे और उनके प्रति दया और करुणा का भाव रखे।
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