वन्या: द्वंद्व 🫀 – 1
जीवा!!! डा… जीवा….. पुकारते-पुकारते इंसान का गला फट गया। फिर भी भगवान जाने, इसकी कान ही क्यों नहीं खुल रहे…
उस आरामकुर्सी पर लंबा होकर लेटे हुए आदमी को देखते हुए मनु काफी देर से गला फाड़कर पुकार रहा था। फिर भी उस लेटे हुए इंसान पर कोई असर ही नहीं हो रहा था।
फिर भी हार न मानते हुए उसने दो बार उसे हिलाया और उतनी ही जोर से दो थप्पड़ भी जड़ दिए। उसके बाद भी मनु ने थोड़ी और ताकत लगाकर पुकारना जारी रखा।
फिर भी उसे आँखें खोलने और हल्का-सा हूँ… करने में काफी वक्त लग गया।
“ओह… कितने बजे हैं रे…???”
आँखों पर पड़ रही बल्ब की तेज रोशनी से चेहरा सिकोड़ते हुए, थोड़ी झुंझलाहट भरी आवाज़ में जीवा ने पूछा।
“समय…? दस बज चुके हैं… अभी भी अगर मैं तुझे ही देखता खड़ा रहा ना, तो वो लड़की मुझे घर में घुसने नहीं देगी। तुझे पता ही है ना, एक समय के बाद मेरे लिए सिर रखने की जगह भी बाहर की चौखट ही होती है।”
मनु ने अधीर होकर कहा तो जीवा मुस्कुराते हुए आरामकुर्सी से उठ गया।
सीने पर रखी, आधी पढ़ी हुई किताब उठाकर उसने उसे शेल्फ में रख दिया।
साथ ही हल्की-सी फीकी पड़ चुकी, दरारों से भरी उन चार दीवारों पर जीवा की नज़र पहली बार देखने वाले की तरह घूम गई। उन दीवारों पर नेताओं की मुस्कुराती हुई तस्वीरें और तरह-तरह की तस्वीरें लगी थीं, जो मानो जीवंत होकर धड़क रही हों।
“तू उस दीवार की खूबसूरती देखता खड़ा रहेगा या चलेगा भी…?”
उसका यूँ खड़ा रहना और भाव देखकर तंग आ चुका मनु दाँत पीसते हुए फिर पुकार उठा।
जीवा की तरफ से तब भी बस एक हल्की-सी मुस्कान ही जवाब थी।
“हँसता हुआ मत खड़ा रह, चल… इसे ताला लगाकर घर पहुँचना है मुझे…”
थोड़ा सख्त लहजे में कहते हुए मनु ने जीवा का हाथ पकड़ा और उसे पार्टी ऑफिस से बाहर ले आया।
“ये ऑफिस है ना जीवा… जब भी आओ, यहीं मिल जाता है… लेकिन घर में बैठी बीवी को ढूँढना मुश्किल है। वो जब तक खुद बाहर निकलकर न आ जाए, फिर हाथ-पैर पकड़कर इस आंदोलन को ही छोड़ने की कसम न खिलाऊँ, तब तक मेरे साथ नहीं आती… खैर… तुझसे ये सब कहने का भी क्या फायदा… ये सब खुद भुगतेगा तभी इसका दर्द समझ आएगा…”
कहते-कहते मनु ने ऑफिस को ताला लगाया और चाबी जीवा के हाथ में सौंप दी। फिर दोनों लकड़ी की सीढ़ियों की आखिरी सीढ़ी उतर आए।
“बैठ जा, मैं छोड़ देता हूँ…”
जीवा के बाइक स्टार्ट करते हुए कहने की देर थी कि मनु दौड़कर उसके पीछे बैठ गया।
“अब तू कहे तब जाकर बैठूँगा क्या? इस आधी रात में यहाँ इस जंगल जैसे इलाके से एक गाड़ी तो दूर, एक मक्खी भी नहीं गुज़रती, ये बात तुझे भी पता है और मुझे भी… फिर इतना औपचारिक सवाल क्यों पूछ रहा है भाई…?”
बैठते हुए मनु ने भी कह दिया।
मनु के घर तक थोड़ी दूरी थी।
दोनों आपस में तरह-तरह की बातें करते हुए जब घर के आँगन में बाइक रोकते हैं, तो उसकी पत्नी हिममा बेचैनी से उनका इंतज़ार कर रही थी।
“ओह… इसे नींद भी नहीं आती क्या भगवान…”
मनु की इतनी दयनीय आवाज़ सुनकर सच में जीवा हँस पड़ा।
“अच्छा, चलता हूँ… कल मिलते हैं।”
जीवा की तरफ देखकर सिर हिलाते हुए मनु ने विदा ली।
बाइक मोड़ते समय जीवा की नज़र एक बार फिर उन दोनों पर पड़ी।
इतनी देर से उसके चेहरे पर जो मुस्कान नहीं थी, अब मनु के होंठों पर एक भरपूर मुस्कान खिली हुई थी।
हिमा को अपने करीब खींचना और उसके हाथ को झटककर नाराज़गी के साथ अंदर चले जाना—उस एक नज़र में जीवा ने सब देख लिया।
अनजाने में उसके होंठों पर भी एक हल्की मुस्कान तैर गई।
फिर सिर झटककर उसने उन विचारों को दूर किया।
अगर बाइक थोड़ी तेज चलाए तो दस मिनट में घर पहुँच सकता था। लेकिन घर पहुँचकर भी कोई खास काम नहीं था, इसलिए लगभग बीस मिनट देर से वह घर पहुँचा।
बरामदे की कुर्सी पर आँखें बंद किए ऊँघ रही थी उसकी माँ भवानी।
बरामदे में ग्रिल लगी होने के कारण डरने की कोई बात नहीं थी। यही उसका भरोसा था।
उसने अपनी माँ को कई बार उसी कुर्सी पर झुककर सोते हुए देखा था।
बाइक की आवाज़ सुनकर माँ चौंककर उठी और चेहरा बनाते हुए अंदर चली गई। यह देखकर जीवा भी अंदर चला गया।
“जवानी में बाप ने परेशान किया… और बुढ़ापे में बेटा कर रहा है… बाप बिस्तर पर पड़ा है तो क्या हुआ, उसका वारिस बनकर बेटा तो है ना इंसान का खून चूसने के लिए…”
नाक सिकोड़ते हुए और आँखें पोंछते हुए माँ ने चावल और करी मेज पर परोसने के लिए रख दी।
भूख न होने के बावजूद जीवा ने वह सब उठाकर अपनी प्लेट में परोस लिया।
बस, उसने माँ से एक शब्द भी नहीं कहा।
उसे कोई प्रतिक्रिया न देते देखकर, मानो अब कुछ कहने का कोई फायदा नहीं, माँ अपने कमरे में चली गई।
माँ के जाते ही उसने सब बर्तन वापस रसोई में रख दिए। बचा हुआ चावल अगले दिन गाय को देने वाले पानी के बाल्टी में डाल दिया और बर्तन धोकर अपने कमरे में चला गया।
हर दिन यही होता है।
फिर भी वह क्यों नहीं बदला…?
उस अँधेरे कमरे में खड़े होकर सोचते हुए भी उसे कोई जवाब नहीं मिला।
हल्के-हल्के घूम रहे पंखे की स्पीड बढ़ाकर जीवा बाथरूम में चला गया।
सिर्फ शरीर पर थोड़ा पानी डालते ही उसे राहत महसूस हुई।
एक पुरानी सफेद धोती लपेटकर जब वह बाथरूम से बाहर आया तो पूरे शरीर में ठंडक महसूस हुई।
अब जाकर थोड़ी राहत मिली थी।
पालक्काड़ की गर्मी के बारे में तो कहना ही क्या…
गीला तौलिया कमरे में टेबल के पास रखी लकड़ी की कुर्सी पर फैलाकर, उसी अँधेरे में बिस्तर पर बैठते हुए उसे फिर हैरानी हुई।
उसे उस अँधेरे का भी आदी हो जाना अजीब लगता था।
लेकिन जब वह सोचता कि इन सबकी वजह तो वही है…
वह बिस्तर पर लेटकर सिर थोड़ा मोड़कर देखने लगा।
दूसरी तरफ करवट लेकर सोई हुई एक आकृति।
उसे देखकर आँखों को थोड़ी ठंडक तो महसूस होती थी, लेकिन न देखना ही बेहतर था।
“हाथी भी आकर धक्का मार दे, तब भी शायद ये नहीं उठेगी…”
कमरे में इतनी हलचल होने के बावजूद बिना जरा भी हिले सो रही उस लड़की को देखकर उसने मन ही मन कहा।
फिर आँखें बंद करके न जाने कितनी बातें सोचते-सोचते वह कब नींद में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।
जीवा की साँसें सामान्य हुईं, तभी वृंदा को थोड़ी राहत मिली।
एक लंबी साँस लेते हुए जब वह बिस्तर पर सीधी लेटी, तो इतनी देर एक ही करवट में लेटे रहने का दर्द उसके शरीर में भी फैल गया।
फिर भी उसकी आँखों ने किसी और चीज़ की परवाह नहीं की।
वे सीधे जाकर उस मासूम चेहरे पर टिक गईं।
काँच की खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी में इतनी करीब से साफ दिखाई दे रहे उस मासूम चेहरे पर…
…..
सुबह आँखें खुलने से पहले ही जब दूसरी तरफ का खाली बिस्तर दिखाई दिया, तो वृंदा के भीतर से एक गहरी साँस निकल गई।
सिर झटककर वह कमरे से बाथरूम में गई और फ्रेश होकर बाहर आई, तभी आँगन से दूर जाती बाइक की आवाज़ सुनाई दी।
अब यह वृंदा के लिए कोई नई बात नहीं थी।
हर दिन की तरह एक और दिन…
“तू अभी उठकर आ रही है? वो तो चला भी गया, लड़की!”
उठते ही रसोई में आई वृंदा को देखकर भवानी ने थोड़े गुस्से में उस दिन की पहली लड़ाई शुरू कर दी।
“वो लड़का घर में आकर सोता है, तुझे पता तक नहीं चलता! कम से कम उसके उठकर जाने पर एक गिलास पानी ही अपने हाथ से दे देती। उसके लिए भी थोड़ा उठकर मेहनत करने में तुझे इतनी परेशानी क्यों होती है, वृंदा…?”
“मैंने इसके लिए कोशिश नहीं की, ऐसा तो नहीं है माँ…
सब कुछ करके देख चुकी हूँ…
और अब मैं कुछ भी करूँ, वो इंसान मेरे सामने आने को तैयार ही नहीं है।
ऐसा लगता है जैसे उसे ये भी पता नहीं कि मैं नाम की कोई इंसान इस घर में ज़िंदा हूँ।
तो फिर मुझे समझाने के बजाय ये सब अपने बेटे से ही कह देतीं ना माँ…”
भवानी की तरफ हाथ बाँधकर किचन काउंटर पर टिकते हुए वृंदा ने उसी अंदाज़ में जवाब दिया।
भवानी का चेहरा थोड़ा और फूल गया।
“ये कैसे हो सकता है… इंसान को काटकर खाने जैसा जवाब देती हो तुम! फिर मेरा बेटा तुम्हारे करीब कैसे आएगा? सबसे पहले अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाना सीखो!”
उल्टा जवाब देने वाली वृंदा भवानी को बिल्कुल पसंद नहीं थी। उनका गुस्सा और बढ़ गया।
सुबह-सुबह शांति चली गई, इस भाव के साथ वृंदा ने भी मुँह फुलाकर चाय के लिए पानी रख दिया।
“पैरों में इतना दर्द है कि चलना मुश्किल हो गया है… आज वैद्य को दिखाना पड़ेगा… पैर के अंगूठे से लेकर पूरा पैर सुन्न होकर ऊपर तक चढ़ रहा है…”
दर्द का नाटक करते हुए भवानी रसोई से बाहर चली गई।
वृंदा ने जैसे यह सब कितनी बार देखा हो, उसी अंदाज़ में बाकी काम करने शुरू कर दिए।
नाश्ता बनाया, रसोई साफ की और घड़ी की तरफ देखा तो आठ बज चुके थे।
फिर वृंदा के लिए भाग-दौड़ शुरू हो गई।
एक नई कॉटन साड़ी करीने से पहनकर, बैग कंधे पर डालकर अंदर आती है तो उसने देखा कि जीवा डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खा रहा था।
“ये कब आया… बाइक की आवाज़ तो मैंने सुनी ही नहीं…”
उसके बैठने और खाने को देखकर बुदबुदाते हुए वह भी कुर्सी खींचकर बैठ गई।
लेकिन घर में कोई आया है, बैठा है या खा रहा है—इस बात पर ध्यान दिए बिना वह खाना खाता रहा।
वृंदा बीच-बीच में सिर उठाकर उसे देखती, लेकिन उसकी तरफ से एक बार भी नज़र उठकर वृंदा पर नहीं आई।
“ह्म्म… ह्म्म… सुनिए…!”
जब उसे लगा कि वह उसे बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहा, तो वृंदा ने खुद गला साफ किया।
“ह्म्म… क्या है…?”
उसने सिर्फ आँखें उठाकर उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
“आज मुझे स्कूल तक छोड़ देंगे…?”
उसने थोड़ी मासूमियत मिलाकर पूछा।
“मेरे पास समय नहीं है… तुम आमतौर पर बस से ही जाती हो ना… आज भी वैसे ही चली जाओ…”
लापरवाही से कहते हुए उसने खाना खत्म किया और उठ गया।
उससे इतनी ही उम्मीद थी, ऐसा सोचकर वृंदा ने भी होंठ सिकोड़ लिए।
छिपकर उन्हें देख रही भवानी के दाँत आपस में भींच गए।
“ए लड़की… मैंने तुम्हें अपनी ज़ुबान संभालने के लिए कितनी बार कहा है! मेरा बेटा आज भी बिना ठीक से खाए उठकर चला गया। देखकर तुम्हें चैन मिल गया ना…! रोज़ ऐसे मेरे बच्चे का निवाला छीनने की कोई मन्नत माँगकर आई हो क्या, इस घर की महारानी बनकर…?”
वॉश बेसिन के पास गए बेटे को देखते हुए भवानी वृंदा के पास आई और आवाज़ धीमी करके उसे जलाते हुए बोली।
**”ओह… मरने से बचने जितना खाना तो उसके पेट में पहुँच ही गया है…!
और जहाँ तक मुझे इस घर की महारानी बनाकर लाने की बात है, न मैंने और न ही मेरे परिवार ने किसी के पैर पकड़े थे…
मेरे घर आकर, मेरे परिवार के हाथ-पैर पकड़कर अपने बेटे के लिए एक जीवन बनाने आई थीं आप और आपका वो लाड़ला बेटा—ये बात आप खुद से बेहतर कौन जानता है…?
तो बात ये है कि जब मुझे और मेरे परिवार को धोखा देकर इस घर में महारानी बनाकर ला रही थीं, तब आपको सोचना चाहिए था कि ये सब देखकर और सुनकर मैं भी चुप बैठने वाली नहीं हूँ।”**
उन्हें तिरस्कार से देखते हुए वृंदा ने कहा और अपनी प्लेट लेकर रसोई की तरफ चली गई।
“ये प्लेट कौन उठाएगा, ओ बदतमीज़ लड़की…?”
बेटे के बाइक लेकर निकलते ही भवानी ने आवाज़ ऊँची कर दी।
बर्तन धोकर रसोई से हॉल में आई वृंदा ने बैग कंधे पर डाला और उन्हें तीखी नज़र से देखा।
“खाया हुआ बर्तन ही तो है… दो कदम चलकर उस सामने वाली रसोई में रख देने के लिए उस लाड़ले के हाथ-पैर में लकवा तो नहीं मारा था ना…?”
जवाब सुनकर भवानी ने उसे घूरकर देखा।
मानो अपने बेटे की देखभाल करने के लिए ही इसे इस घर में लाया गया हो…
फिर वृंदा ने कहा,
“और एक बात कह दूँ माँ… आपका ये उछलना-कूदना है ना…
उस सूरज को घुटनों पर उगते हुए भी नहीं देखने वाली एक औरत यहाँ है…
उधर जाकर ये सब दिखाइए।
फिर उस बाइक लेकर गए लाड़ले के सामने हो या यहाँ वापस आने वाले मेरे सामने—मत दिखाइए…”
भवानी को एक चेतावनी भरी नज़र से देखते हुए वृंदा ने कहा और घर से बाहर निकल गई।
वृंदा के जाते ही भवानी गुस्से से चेहरा चढ़ाए सीधे अपने पति के पास पहुँचीं, जो आँखें बंद करके लेटे हुए थे।
“आपने भी आज की लड़ाई सुनी ना… इसका कोई फैसला करना ही पड़ेगा। इस घर में आई हुई लड़कियों की डाँट और ताने सुनकर जीने की मजबूरी इस भवानी की नहीं है…”
इतने गुस्से में अपनी शिकायत कहती भवानी को उनके पति ने तीखी नज़र से देखा।
“उस बच्ची ने ऐसा क्या गलत कहा, भवानी?
जब सोचता हूँ कि उस बच्ची की जवानी हमारे इस घर में ऐसे ही नर्क बनकर बीत रही है, तो मेरे सीने में डर बैठ जाता है…”
“आपको क्या पता, इंसान…
उसे इस घर में नर्क दिखता है क्या…?
मैं दो बातें कहती हूँ तो वो दस बातें सुनाती है… मनहूस…”
वृंदा का पक्ष लेते हुए पति का बोलना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसके लिए जो गुस्सा था, वही उनके शब्दों में भी उतर आया।
**”एक बार खुद को उस बच्ची की जगह रखकर सोचो भवानी…
अगर हमारी बेटी के साथ ऐसा होता तो…?
जब सोचता हूँ कि सिर्फ मेरी ज़िद की वजह से एक लड़की की ज़िंदगी बर्बाद हो रही है, तो…”**
इतना कहते हुए उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा।
**”देखिए… उस लड़की के बारे में सोच-सोचकर खुद को कुछ मत कर लेना…
एक तरह से उसकी भी तो गलती है…
शादी को तीन महीने होने वाले हैं…
फिर भी उसने मेरे बेटे को अपने करीब आने दिया क्या…?
ऐसा कैसे होगा?
रात के नौ बजते ही उसके लिए आधी रात हो जाती है।
क्या उसने कभी मेरे बच्चे के लिए उस दरवाज़े को एक बार भी खोला है?
जब वो सुबह उठता है, क्या उसके हाथ से एक बूँद पानी भी देती है?
हर चीज़ के लिए मुझे ही होना पड़ता है…
क्या उसे इस घर में जीवन भर मेरे बेटे की देखभाल न करने के लिए पाल-पोसकर लाया गया है…?”**
वह वृंदा के आने के बाद से हुई हर बात को याद करके गुस्से में कहती चली गई।
**”तुम यूँ अपने मन में बातें मत बनाओ भवानी…
तुम्हारा बेटा भी कोई कम नहीं है।
वो लड़की कब सोती है, कब उठती है—सब देखकर समय पर वहाँ से गायब हो जाने वाला भी तो वही चालाक है।
हर बात के लिए सिर्फ एक इंसान को दोष मत दो। दूसरी तरफ भी सोचकर देखो।
विवाह के बाद हर लड़की के कुछ सपने और इच्छाएँ होती हैं…
वैसे ही वृंदा के भी थे।
उन सपनों को कुचलने वाला हमारा बेटा है—ये क्यों नहीं याद रहता तुम्हें…?”**
फिर उन्होंने कहा,
**”अब जब तुमने इतना कुछ कह ही दिया है, तो मैं भी एक बात कहता हूँ…
अब से उसके मामले में तुम बिल्कुल दखल मत देना।
वो आए तो दरवाज़ा खोलने के लिए तुम खड़ी रहती हो, इसलिए उसे इतना आसान लगता है।
अब तुम मत जाना…
जिसे अंदर आकर सोना होगा, वो समय पर आएगा।
सुबह चाय चाहिए तो वो अपने साथ लाई हुई पत्नी बनाकर लाई गई लड़की ही बनाकर देगी।
तुम बस हमारी बेटी और मेरा ध्यान रखो।”**
“ये कैसे सही होगा…?
और फिर वो लड़की मेरे बेटे को भूखा मारती रहे और मैं बस देखती रहूँ…?
वो लड़की अंदर आराम से सोए और मेरा बेटा इस घर के बाहर ठंड में पड़ा रहे—यही कह रहे हैं आप…?”
पति का फैसला बिल्कुल पसंद न आने पर भवानी चीख पड़ीं।
“मैंने जो कहना था कह दिया।
अगर तुम्हें सुनना नहीं है, तो उस बच्ची को उसके घर वापस भेज दो…
और भेजते समय जो दहेज लेकर आई थी, उसका एक-एक सामान बिना कुछ रोके वापस देना, भवानी।”
इतना कहकर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे अब उन्हें न कुछ कहना था और न ही कुछ सुनना।
जारी रहेगा….. ❤️
एक छोटी-सी कहानी….. पढ़ने वाले दो लाइन अपनी राय ज़रूर बताना… ❤️
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